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  • May 20, 2026
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क्या आपको पता है? HIPEC (हीटेड इंट्रापेरिटोनियल कीमोथेरेपी) कैसे काम करता है? कीमोथेरेपी 410 से 430C सेल्सियस तक गर्म होती है विशेष मशीन द्वारा पेट में परिचालित गरम किया हुआ रसायन कैंसर कोशिकाओं को भेदता है और मारता है

अहमदाबाद के शाह्स कैंसर सेंटर में एक महिला मरीज और उनके परिवार को डिजिटल चार्ट के माध्यम से हाइपेक (HIPEC) थेरेपी के मिथकों और वैज्ञानिक सच्चाई के बारे में समझाते हुए वरिष्ठ ऑन्कोलॉजिस्ट।

जब किसी मरीज या उनके परिवार को पहली बार HIPEC (Hyperthermic Intraperitoneal Chemotherapy) यानी हाइपेक (गर्म कीमोथेरेपी) कराने की सलाह दी जाती है, तो उनके मन में कौतूहल और डर का एक मिला-जुला भाव पैदा होता है। इंटरनेट पर “गर्म कीमोथेरेपी” या “पेट के अंदर उबलती दवा” जैसी भ्रामक बातें पढ़कर मरीज अक्सर अत्यधिक तनाव में आ जाते हैं। वे सोचने लगते हैं कि यह कोई बहुत ही दर्दनाक या प्रयोगात्मक (Experimental) इलाज है।

इंडियन ओवरी कैंसर इंस्टीट्यूट (IOCI) और शाह्स कैंसर एंड रोबोटिक सर्जरी सेंटर, अहमदाबाद में हमारा यह मानना है कि आधा अधूरा ज्ञान हमेशा डर को बढ़ाता है। जब आपके पास सही और प्रामाणिक जानकारी होती है, तो आप पूरी हिम्मत के साथ बीमारी का सामना कर सकते हैं। आइए, एक वरिष्ठ कैंसर विशेषज्ञ के नजरिए से हाइपेक थेरेपी से जुड़े सबसे आम मिथकों (Myths) और उनकी वैज्ञानिक सच्चाई (Facts) को बेहद सरल शब्दों में समझते हैं।

मिथक १: “हाइपेक एक उबलता हुआ और अत्यधिक दर्दनाक इलाज है”

सच्चाई:

यह सबसे बड़ा मिथक है। ‘हाइपरथर्मिक’ शब्द सुनकर लोग सोचते हैं कि पेट में उबलता हुआ पानी डाला जाता है जो अंदर के अंगों को जला देगा।

वास्तव में, हाइपेक के दौरान दवा का तापमान केवल ४२ डिग्री सेल्सियस (लगभग १०७.६ डिग्री फारेनहाइट) रखा जाता है। यह तापमान हमारे शरीर के बहुत तेज बुखार (High Fever) जितना ही होता है। यह तापमान कैंसर की संवेदनशील कोशिकाओं को नष्ट करने के लिए तो पर्याप्त है, लेकिन हमारे पेट के सामान्य अंगों (जैसे आंतों और लिवर) को इससे कोई नुकसान नहीं पहुंचता।

इसके अलावा, यह पूरी प्रक्रिया तब की जाती है जब मरीज ऑपरेशन थिएटर में पूर्ण एनेस्थीसिया (बेहोशी) के असर में होता है। इसलिए प्रक्रिया के दौरान मरीज को किसी भी तरह के दर्द या जलन का अहसास बिल्कुल नहीं होता।

मिथक २: “यह एक नया और प्रयोगात्मक (Experimental) इलाज है जिसकी सफलता तय नहीं है”

सच्चाई:

हाइपेक कोई नया या बिना जांचा-परखा इलाज नहीं है। वैश्विक चिकित्सा जगत में पिछले दो से तीन दशकों से इस पर गहन शोध और क्लिनिकल ट्रायल चल रहे हैं।

आज के समय में दुनिया भर के प्रतिष्ठित कैंसर गाइडलैन्स (जैसे NCCN और FIGO) एडवांस ओवेरियन कैंसर (अंडाशय के कैंसर), पेरिटोनियल कैंसर और अपेंडिक्स के कैंसर के लिए हाइपेक को एक प्रामाणिक और बेहद प्रभावी मानक उपचार (Standard of Care) मानते हैं। यह एक पूरी तरह से वैज्ञानिक और स्वीकृत पद्धति है जिसने एडवांस स्टेज के मरीजों के जीवन को लंबा करने में अभूतपूर्व सफलता हासिल की है।

मिथक ३: “अगर हाइपेक करा लिया, तो सामान्य कीमोथेरेपी की जरूरत नहीं पड़ेगी”

सच्चाई:

हाइपेक और पारंपरिक नस वाली कीमोथेरेपी एक-दूसरे के विकल्प नहीं हैं, बल्कि ये एक-दूसरे के पूरक (सप्लीमेंट) हैं।

  • नस वाली कीमोथेरेपी (IV Chemotherapy): पूरे शरीर के रक्त प्रवाह में घूमकर उन कैंसर कणों को मारती है जो शायद पेट से बाहर निकल चुके हों।
  • हाइपेक (HIPEC): पेट के स्थानीय हिस्से (Local Cavity) में छिपे उन सूक्ष्म दानों को मारता है जहाँ नस वाली दवा पूरी मात्रा में नहीं पहुंच पाती।

आमतौर पर एडवांस ओवेरियन या पेरिटोनियल कैंसर में हम मरीज को सर्जरी से पहले या बाद में नस वाली कीमोथेरेपी के चक्र (Cycles) देते हैं, और सर्जरी के ठीक बीच में हाइपेक का इस्तेमाल करते हैं। यह कंबाइंड अप्रोच ही मरीज को बीमारी से लंबे समय तक सुरक्षित रखती है।

मिथक ४: “इसके साइड इफेक्ट्स पारंपरिक कीमोथेरेपी से भी ज्यादा खतरनाक होते हैं”

सच्चाई:

सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। पारंपरिक कीमोथेरेपी जब नस के जरिए पूरे शरीर में घूमती है, तो वह स्वस्थ कोशिकाओं को भी नुकसान पहुंचाती है, जिससे बाल झड़ना, अत्यधिक उल्टी, मुंह में छाले और इम्युनिटी का गंभीर रूप से कम होना जैसे साइड इफेक्ट्स दिखते हैं।

चूंकि हाइपेक की दवा सीधे पेट के खोखले हिस्से में डाली जाती है और यह पेट की झिल्ली को पार करके खून में बहुत ही न्यूनतम मात्रा में अवशोषित होती है, इसलिए इसके पूरे शरीर पर होने वाले साइड इफेक्ट्स न के बराबर होते हैं। इससे बाल झड़ने या गंभीर मतली जैसी समस्याएं नहीं होतीं। हां, चूंकि यह एक बड़े ऑपरेशन के साथ जुड़ी है, इसलिए पेट में अस्थाई भारीपन या कमजोरी महसूस हो सकती है, जो समय के साथ पूरी तरह ठीक हो जाती है।

मिथक ५: “हाइपेक पेट के हर कैंसर के मरीज के लिए उपयोगी है”

सच्चाई:

हाइपेक एक बेहद कस्टमाइज्ड और चुनिंदा थेरेपी है। यह पेट के हर कैंसर में काम नहीं आती। यह मुख्य रूप से उन्हीं कैंसरों में प्रभावी है जो पेट की अंदरूनी परत यानी पेरिटोनियम झिल्ली (Peritoneum Lining) तक ही सीमित होते हैं, जैसे:

  • एडवांस स्टेज का ओवेरियन कैंसर
  • प्राथमिक पेरिटोनियल कैंसर
  • अपेंडिक्स का म्यूसिनस ट्यूमर (जेली बेली)
  • कोलोन या स्टमक कैंसर जो केवल पेट के अंदर फैला हो

यदि कैंसर पेट के दायरे से बाहर निकलकर हड्डियों, फेफड़ों के अंदरूनी हिस्से या दिमाग तक पहुंच चुका है, तो हाइपेक की सलाह नहीं दी जाती है। हमारे अहमदाबाद सेंटर में डॉक्टरों की टीम मरीज की फिटनेस, उम्र और बीमारी के सटीक फैलाव का आकलन करने के बाद ही इसका चयन करती है।

मरीज के परिवारों के लिए व्यावहारिक सलाह

अगर आपके डॉक्टर ने मरीज के लिए हाइपेक की सलाह दी है, तो इंटरनेट पर मौजूद डरावनी और अप्रामाणिक बातों पर भरोसा करके इलाज में देरी न करें। अपने ऑन्को-सर्जन से सीधे बात करें, प्रक्रिया के चरणों को समझें और मानसिक रूप से सकारात्मक रहें। इलाज के इस दौर में मरीज को शारीरिक आराम के साथ-साथ परिवार के अटूट भरोसे और स्नेह की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।

निष्कर्ष

हाइपेक (HIPEC) थेरेपी चिकित्सा विज्ञान का एक ऐसा आधुनिक और परोपकारी आविष्कार है जिसने एडवांस स्टेज के कैंसर मरीजों के इलाज की परिभाषा को बदल दिया है। इसके डर और मिथकों से बाहर निकलकर जब हम इसकी वैज्ञानिक सच्चाई को स्वीकार करते हैं, तो जीत की राह और आसान हो जाती है। शाह्स कैंसर एंड रोबोटिक सर्जरी सेंटर, अहमदाबाद में हमारा मिशन हमेशा यही रहा है कि हम दुनिया की सबसे बेहतरीन तकनीक को मानवीय संवेदनाओं के साथ आप तक पहुँचा सकें। सकारात्मक रहें, सजग रहें।

🔸अधिक जानकारी के लिए आप देख सकते हैं: https://bit.ly/3y2g6i0

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