
जब कैंसर से जूझ रहे किसी मरीज का पेट अचानक फूलने लगता है, भारी हो जाता है या उसमें तेजी से उभार आने लगता है, तो यह स्थिति मरीज और परिवार दोनों के लिए अत्यंत चिंताजनक होती है। चिकित्सा की भाषा में पेट में इस तरह असामान्य रूप से पानी या तरल पदार्थ जमा होने को जलोदर (Ascites या एसाइटिस) कहा जाता है। जब यह समस्या कैंसर के कारण होती है, तो इसे मैलिग्नेंट एसाइटिस (Malignant Ascites) या पेरिटोनियल कार्सिनोमैटोसिस से जुड़ा जलोदर भी कहते हैं। यह मुख्य रूप से एडवांस ओवेरियन कैंसर (अंडाशय का कैंसर), पेरिटोनियल कैंसर या पेट के अन्य अंगों के कैंसर में देखने को मिलता है।
इंडियन ओवरी कैंसर इंस्टीट्यूट (IOCI) और शाह्स कैंसर एंड रोबोटिक सर्जरी सेंटर, अहमदाबाद में हमारा यह निरंतर प्रयास रहता है कि मरीजों को बीमारी के लक्षणों से जुड़ी हर तकलीफ का न केवल आधुनिक इलाज मिले, बल्कि उन्हें और उनके परिवार को मानसिक संबल भी मिले। आइए, एक वरिष्ठ कैंसर विशेषज्ञ के नजरिए से बेहद सरल भाषा में समझते हैं कि कैंसर में पेट में पानी क्यों भरता है, इसके क्या लक्षण हैं और आज चिकित्सा विज्ञान में इसे नियंत्रित करने के क्या बेहतरीन और परोपकारी उपाय मौजूद हैं।
हमारे पेट के अंदरूनी हिस्से में एक बेहद महीन और सुरक्षात्मक झिल्ली होती है जिसे पेरिटोनियम (Peritoneum) कहा जाता है। सामान्य स्थिति में यह झिल्ली थोड़ा सा प्रवाही बनाती है ताकि पेट के अंदरूनी अंग आपस में न रगड़ें और सुचारू रूप से काम कर सकें। लेकिन कैंसर की स्थिति में यह संतुलन बिगड़ जाता है:
शुरुआती दौर में मरीज को पेट में भारीपन या गैस की शिकायत हो सकती है, लेकिन जैसे-जैसे पानी की मात्रा (जो कई बार ४ से ५ लीटर या उससे भी अधिक हो सकती है) बढ़ती है, निम्नलिखित तकलीफें सामने आती हैं:
याद रखें: पेट में पानी भरना तकलीफदेह जरूर है, लेकिन आज के समय में हमारे पास ऐसे कई प्रभावी उपचार मौजूद हैं जो मरीज को इस भारीपन और दर्द से तुरंत राहत दिला सकते हैं।
इलाज शुरू करने से पहले डॉक्टर पेट का अल्ट्रासाउंड (सोनोग्राफ्री) या CT स्कैन करते हैं ताकि यह देखा जा सके कि पेट में पानी कितनी मात्रा में है और वह किन कोनों में जमा है।
इसके बाद, अल्ट्रासाउंड की देखरेख में एक बेहद पतली सुई के जरिए पेट से थोड़ा सा पानी निकाला जाता है और उसे लैब में जांच के लिए भेजा जाता है। इसे फ्लूइड साइटोलॉजी (Fluid Cytology) कहते हैं। इससे यह पक्का हो जाता है कि पानी के अंदर कैंसर की कोशिकाएं मौजूद हैं या नहीं, और इसी के आधार पर आगे के इलाज की दिशा तय की जाती है।
शाह्स कैंसर एंड रोबोटिक सर्जरी सेंटर, अहमदाबाद में हमारा उद्देश्य केवल कैंसर की मुख्य गांठ का इलाज करना नहीं है, बल्कि मरीज को पेट के इस असहज भारीपन से मुक्ति दिलाकर उनके जीवन को आरामदायक बनाना है। इसके लिए निम्नलिखित पद्धतियां अपनाई जाती हैं:
जब पेट में पानी बहुत ज्यादा बढ़ जाता है और मरीज का सांस लेना दूभर हो जाता है, तब पैरासेंटेसिस (Paracentesis) प्रक्रिया की मदद से पेट में एक छोटी, सुन्न करने वाली सुई और कैथेटर डालकर अतिरिक्त पानी को सुरक्षित रूप से बाहर निकाल दिया जाता है।
चूंकि पानी भरने का असली कारण कैंसर कोशिकाएं हैं, इसलिए जैसे ही कैंसर विशेषज्ञ कीमोथेरेपी की दवाएं शुरू करते हैं, पेट के अंदर मौजूद कैंसर के कण नष्ट होने लगते हैं। जैसे-जैसे कैंसर नियंत्रण में आता है, पेट में पानी का दोबारा बनना अपने आप बहुत कम या पूरी तरह बंद हो जाता है।
एडवांस ओवेरियन कैंसर और पेरिटोनियल कैंसर के मरीजों में जहाँ पानी बार-बार भर रहा हो, वहाँ साइटोरिडक्टिव सर्जरी (Cytoreductive Surgery) यानी पेट की पूरी सफाई के साथ HIPEC (Hyperthermic Intraperitoneal Chemotherapy) का तालमेल अद्भुत परिणाम देता है।
कुछ मरीजों में, जहाँ बीमारी बहुत एडवांस होती है और पानी बार-बार तेजी से भरता है, वहाँ बार-बार अस्पताल आकर सुई लगवाने की तकलीफ से बचाने के लिए पेट में एक छोटा, सुरक्षित और परमानेंट कैथेटर (पतली नली) डाल दिया जाता है। इसके जरिए परिवार के लोग घर पर ही बेहद आसानी से और बिना किसी दर्द के अतिरिक्त पानी को एक बैग में ड्रेन कर सकते हैं। इससे मरीज को बार-बार अस्पताल भागने की मानसिक और शारीरिक थकावट से मुक्ति मिलती है।
कैंसर के मरीजों में जब पेट में पानी भरता है, तो घर पर की जाने वाली देखभाल उनके शारीरिक कष्ट को काफी हद तक कम कर सकती है:
कैंसर के कारण पेट में पानी भरना निश्चित रूप से एक संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण स्थिति है, लेकिन इसे आज के आधुनिक चिकित्सा युग में बहुत ही प्रभावी और सुरक्षित तरीकों से प्रबंधित किया जा सकता है। शाह्स कैंसर एंड रोबोटिक सर्जरी सेंटर, अहमदाबाद में हमारा यह दृढ़ विश्वास है कि सही समय पर की गई सहायक देखभाल (Palliative & Supportive Care) और आधुनिक सर्जिकल तकनीकों के प्रयोग से हम हर मरीज की तकलीफ को न्यूनतम कर सकते हैं। बीमारी के इस पड़ाव पर निराश न हों; सही डॉक्टरी परामर्श और स्नेहपूर्ण देखभाल ही मरीज के जीवन में सुकून ला सकती है।
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