
जब किसी मरीज को लगातार पेट फूलने, अपच या वजन बढ़ने की शिकायत होती है और जांच के बाद डॉक्टर ‘जेली बेली’ (Jelly Belly) या वैज्ञानिक भाषा में सूडोमायक्सोमा पैरिटोनी (Pseudomyxoma Peritonei – PMP) नामक बीमारी का नाम लेते हैं, तो मरीज और उनका परिवार पूरी तरह असमंजस में पड़ जाता है। यह नाम सुनने में जितना अजीब लगता है, चिकित्सा विज्ञान में यह उतनी ही जटिल और दुर्लभ बीमारी मानी जाती है। आम लोगों के लिए इसके बारे में सही जानकारी ढूंढ पाना बहुत मुश्किल होता है, क्योंकि इसके मामले बहुत कम देखने को मिलते हैं।
इंडियन ओवरी कैंसर इंस्टीट्यूट (IOCI) और शाह्स कैंसर एंड रोबोटिक सर्जरी सेंटर, अहमदाबाद में हमारा यह निरंतर प्रयास रहता है कि हम जटिल से जटिल बीमारियों को बेहद सरल और मरीज के अनुकूल भाषा में समझा सकें। जब परिवार बीमारी के सही स्वरूप को समझ लेता है, तो डर दूर हो जाता है और इलाज का रास्ता साफ दिखाई देने लगता है। आइए, एक वरिष्ठ कैंसर विशेषज्ञ के दृष्टिकोण से समझते हैं कि जेली बेली वास्तव में क्या है, इसके क्या लक्षण हैं और आज हमारे पास इसके इलाज के लिए क्या अत्याधुनिक विकल्प मौजूद हैं।
‘जेली बेली’ कोई साधारण मोटापा या चर्बी नहीं है। चिकित्सा की भाषा में इसे सूडोमायक्सोमा पैरिटोनी (PMP) कहा जाता है। यह पेट के अंदरूनी हिस्से की एक बेहद दुर्लभ स्थिति है, जिसमें पूरे पेट और पेल्विक कैविटी (पडू के हिस्से) के अंदर एक गाढ़ा, चिपचिपा और जेली जैसा बलगम (Mucus) जमा होने लगता है।
यह बीमारी कहाँ से शुरू होती है?: ज्यादातर मामलों में, इस बीमारी की शुरुआत पेट में मौजूद एक छोटे से अंग अपेंडिक्स (Appendix) से होती है। अपेंडिक्स के भीतर एक छोटा सा धीमी गति वाला ट्यूमर (Mucinous Tumor) बनता है, जो लगातार म्यूकस (जेली) बनाता रहता है। समय के साथ जब अपेंडिक्स इस जेली के दबाव को नहीं झेल पाता, तो वह फट जाता है। फटने के बाद ये जेली बनाने वाली कोशिकाएं पूरे पेट की अंदरूनी झिल्ली यानी पेरिटोनियम (Peritoneum) पर फैल जाती हैं और वहां चिपक कर लगातार जेली का निर्माण करने लगती हैं। धीरे-धीरे यह जेली पूरे पेट में भर जाती है, जिसके कारण इसे ‘जेली बेली’ कहा जाता है।
महिलाओं में, कई बार यह बीमारी ओवेरियन ट्यूमर (अंडाशय के म्यूसिनस ट्यूमर) जैसी दिखाई दे सकती है या उससे जुड़ी हो सकती है, इसलिए इसका सटीक अंतर समझना बेहद जरूरी होता है।
चूंकि यह बीमारी बहुत धीमी गति से बढ़ती है, इसलिए शुरुआत में इसके लक्षण पकड़े नहीं जाते। मरीज अक्सर इसे सामान्य गैस, ब्लोटिंग या वजन बढ़ना मान लेते हैं। जैसे-जैसे जेली की मात्रा पेट में बढ़ती है, निम्नलिखित लक्षण दिखाई देने लगते हैं:
जेली बेली का सही समय पर पता लगाना एक बड़ी चुनौती है। इसके लिए शाह्स कैंसर सेंटर, अहमदाबाद में हम इन आधुनिक जांचों की मदद लेते हैं:
१. CT स्कैन और MRI (पूरी एब्डोमेन और पेल्विस): यह इस बीमारी को पकड़ने का सबसे बेहतरीन जरिया है। स्कैन में पेट के अंदर जेली का जमाव, आंतों पर उसका दबाव और लिवर या तिल्ली की सतह पर जेली की विशेष परत (Scalloping Effect) साफ दिखाई देती है।
२. ट्यूमर मार्कर्स (CEA, CA-19.9, CA-125): ये विशेष ब्लड टेस्ट हैं। जेली बेली के मरीजों में इन प्रोटीन्स का स्तर अक्सर सामान्य से काफी अधिक पाया जाता है।
३. बायोप्सी या फ्लूइड असेसमेंट: अंतिम पुष्टि के लिए पेट के अंदर से जेली या ऊतक (Tissue) का एक छोटा सा नमूना लेकर लैब में जांचा जाता है ताकि कोशिकाओं के प्रकार को समझा जा सके।
कई साल पहले तक जेली बेली का इलाज केवल पेट से जेली को बाहर निकाल देना था, जिससे बीमारी बार-बार वापस आ जाती थी। लेकिन आज आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने इसका एक बेहद प्रभावी और मुकम्मल इलाज ढूंढ निकाला है, जिसे ‘अग्र्रेसिव कंबाइंड थेरेपी’ कहा जाता है।
यह एक बेहद विस्तृत और बड़ी सर्जरी है। सर्जन का लक्ष्य पेट के अंदर जमा हर एक चम्मच जेली को बाहर निकालना और पेरिटोनियम झिल्ली के उन सभी हिस्सों को हटाना होता है जहाँ जेली बनाने वाली कोशिकाएं चिपकी हुई हैं। इसमें अपेंडिक्स, पित्ताशय (Gallbladder) और झिल्ली की परतों (Omentum) को हटाना शामिल हो सकता है। इसे पेट की पूरी सफाई या ‘डीबल्किंग’ कहा जाता है।
साइटोरिडक्टिव सर्जरी के तुरंत बाद, जब मरीज अभी ऑपरेशन थिएटर में ही होता है, तब HIPEC (Hyperthermic Intraperitoneal Chemotherapy) तकनीक का उपयोग किया जाता है।
यह एक जटिल ऑपरेशन होता है, इसलिए मरीज को पूरी तरह ठीक होने में ३ से ४ हफ्ते का समय लग सकता है। इस दौरान परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है:
‘जेली बेली’ या सूडोमायक्सोमा पैरिटोनी निश्चित रूप से एक दुर्लभ और गंभीर बीमारी है, लेकिन सही समय पर सही विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में यदि साइटोरिडक्टिव सर्जरी और HIPEC जैसी आधुनिक तकनीकों का सहारा लिया जाए, तो इस बीमारी पर पूरी तरह काबू पाया जा सकता है। शाह्स कैंसर एंड रोबोटिक सर्जरी सेंटर, अहमदाबाद में हमारा अनुभव यही कहता है कि दुर्लभ से दुर्लभ बीमारी के सामने भी यदि आधुनिक विज्ञान और मानवीय संवेदनशीलता एक साथ खड़े हो जाएं, तो जीत निश्चित होती है। डरें नहीं, सही जानकारी और विशेषज्ञ परामर्श ही आपकी सबसे बड़ी ताकत है।
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